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जग्गी अवैध रूप से सीमा पार करता है, लंदन पहुँचने का इरादा रखता है , लेकिन पकड़ा जाता है और वापस दूतावास ले जाया जाता है जहाँ गौतम काम करता है। जग्गी बताता है कि उसे रिसेप्शन के दिन गौतम के भाषण से प्रेरित होकर अपने प्यार को साबित करने के लिए सोमवार से पहले लंदन पहुँचना है। फिल्म तीन महीने पहले की कहानी पर आधारित है।
हॉकी खिलाड़ी जग्गी की मुलाकात तैराक कार्तिका से होती है और हालांकि दोनों की शुरुआत मुश्किल होती है, लेकिन वे साथ में समय बिताना शुरू करते हैं और करीब आते हैं। लेकिन जग्गी को पता चलता है कि कार्तिका शादी करने जा रही है। वह उसे तीन महीने बाद लंदन में मिलने के लिए कहती है, ताकि यह साबित हो सके कि उसका प्यार सच्चा है, ऐसी स्थिति में वह शादी रद्द कर देगी। जग्गी अवैध रूप से यूके में प्रवेश करता है और अपनी शादी से पहले कार्तिका तक पहुँचने की कोशिश में कई बाधाओं का सामना करता है और एक विमान से गिरने के बाद जग्गी की मौत हो जाती है, जिससे कार्तिका का दिल टूट जाता है। फिल्म का अंत कार्तिका के साथ गौतम, इरा और उनके सभी दोस्तों द्वारा जग्गी के जीवन का जश्न मनाने और उसे याद करने की कोशिश के साथ होता है।

जिस कोशिश में शिद्दत नहीं होती वह कोशिश किस काम की. ऊपर-ऊपर यह एक प्रेरक वाक्य लगता है. लेकिन फिल्म शिद्दत में हीरो यह बात अपने प्यार को पाने के लिए कहता है. उसके प्यार की शिद्दत इतनी है कि पहले तो वह पासपोर्ट रद्द होने पर आठ देशों की सीमाएं पार करता हुआ फ्रांस पहुंच जाता है और वहां से इंग्लिश चैनल तैर कर लंदन पहुंचने का प्रयास करता है. जिस लड़की से वह प्यार करता है, उसकी लंदन में शादी हो रही है. रोचक बात यह है कि जिस ओटीटी डिज्नी हॉटस्टार पर फिल्म शिद्दत रिलीज हुई, उस पर शाहरुख खान का एक विज्ञापन आ रहा है. जिसमें शाहरुख का मैनेजर रोमांस की बात निकलने पर कहता है कि सर ‘नाइंटीज’ (1990 का दशक) जा चुका है.
कुणाल देशमुख ने फिल्म ‘शिद्दत’ की एबीसीडी से लेकर एक्सवाईजेड तक कुछ भी करीने से सजाने की कोशिश नहीं की है। कहानी में दम नहीं है। पटकथा में इतने सारे झोल हैं और संगीत भी साल 2021 का नहीं लगता। यूं लगता है जैसे जस्सी और दलेर मेहंदी के किसी पुराने अलबम के गाने उठाकर सचिन जिगर ने फिर से बना दिए हैं। ए श्रीकर प्रसाद ने अपनी तरफ से फिल्म की एडीटिंग चुस्त करने की कोशिश की है लेकिन ये फिल्म 90 मिनट से ज्यादा की नहीं होनी चाहिए थी। अमलेंदु चौधरी का कैमरावर्क बेहतरीन है लेकिन सिर्फ उससे होना भी कुछ नहीं है। डिज्नी प्लस हॉटस्टार की हिंदी फिल्मों की सेलेक्शन टीम को देश का मूड समझने के लिए थोड़ा घूमना फिरना चाहिए। चौक चौबारों पर जाकर देश का मिजाज भी समझना चाहिए। बार बार, लगातार ऐसी कमजोर फिल्में परोसते रहना ओटीटी की ब्रांडिंग के लिए ठीक नही हैं।

शिद्दत आपको टिंडर के जमाने में शाहरुख के जमाने का रोमांस फील कराने की कोशिश करती है. वह दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को भी याद करती है. शिद्दत का हीरो शाहरुख के लेवल की एनर्जी दिखाने की कोशिश में है. फिल्म एनआरआई दुल्हनिया पाने के लिए देसी मुंडे का स्ट्रगल दिखाती है. अगर आप अब भी उस दौर में हैं या फिर उस जमाने का फील पाना चाहते हैं तो यह फिल्म देख सकते हैं. बॉलीवुड में आजकल रोमांटिक कहानियां हीरो या हीरोइन के ‘कमिटमेंट फोबिया’ में अटकी हुई हैं. यहां हीरोइन को हीरो के साथ वन-नाइट-स्टैंड में समस्या नहीं. शादी में है. वह कहती है कि सिर्फ प्यार के लिए शादी नहीं होती, शादी होती है सैटल होने के लिए. प्यार को ठुकराते हुए वह भरी जवानी में अपने बुढ़ापे तक की रील आंखों के सामने चलती देख लेती है. लड़के के ज्यादा जोर देने पर कहती है कि अगर तुझमें तीन महीने तक प्यार की यही शिद्दत भरी फीलिंग बनी रहे तो लंदन आ जाना. लड़के की जिद है कि लड़की ने इस जमाने में सच्चा प्यार देखा नहीं, वह उसे दिखाएगा.

कथा मंडली ने दो जोड़ों को लेकर दो प्रेम कहानियां बनाईं और उन्हें ले जाकर परदेस में जोड़ दिया। शरणार्थी, विदेश में बसने और कुछ कर दिखाने की जिद को शिद्दत का नाम दे दिया। नेशनल स्पोर्ट्स कैंप में हॉकी खेलने वाला अच्छा प्लेयर एक खराब तैरने वाली लड़की पर फिदा हो जाए, बड़ी बात नहीं। लेकिन, जो हरकतें ये हॉकी खिलाड़ी करता दिखता है, ऐसा किसी कैंप में होता नहीं है। और, बदले में महिला खिलाड़ियों का पुरुष खिलाड़ियों की नंगी तस्वीरें खींचना? ये महिला सशक्तीकरण को दिखाने का जिसका भी विचार रहा हो, बहुत घटिया है। बाद में प्रेम, लालसा, आचार, विचार की लंबी बहस है। शाहरुख खान और काजोल जैसे कुछ सीन्स हैं और फिल्म किसी कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन की टैगलाइन जितनी आगे बढ़ने के बाद ढप्पा हो जाती है।
फिल्म लिखते-बनाते वक्त लेखक-निर्देशक जानते हैं कि डीडीएलजे के हैंगओवर को वह नए डिजाइन की बोतल में डाल रहे हैं, इसलिए उससे थोड़ा कुछ अलग और नया करना के चक्कर में ऐसा कमजोर क्लाइमेक्स रच देते हैं, जो कहानी की फ्रेम से पूरी तरह बाहर निकल जाता है. शिद्दत वाले प्यार के बीच अगर जोरदार विलेन न हो तो वह कहानी अधूरी है. यह अधूरापन शिद्दत में पूरी तरह देखा जा सकता है. अगर आप रोमांटिक फिल्मों के पक्के वाले फैन हैं तभी आपको शिद्दत की मोहब्बत रास आएगी. फिल्म का कैमरा वर्क अच्छा है और गीत-संगीत भी सुनने जैसा है. लेकिन कहानी और पटकथा का साथ न मिलने से वह कमजोर पड़ जाता है.
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